अपकमिंग प्रोजेक्ट: संजय लीला भंसाली ने कहा- मुझे मेरे दोस्‍त मोईन बेग ने 14 साल पहले ‘हीरामंडी’ सुनाई थी, नेटफ्ल‍िक्‍स को सुनाई तो उनकी बांछें खिल गईं

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मुंबई42 मिनट पहलेलेखक: अमित कर्ण

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संजय लीला भंसाली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में 25 साल पूरे कर चुके हैं। उनकी ‘गंगूबाई’ बनकर रेडी हो रही है, जबकि आगे वो ‘हीरामंडी’ बनाने वाले हैं। उन्‍होंने कहा,’ जब मैं 4 साल का बच्चा था, तब मेरे पिता जी मुझे एक शूटिंग दिखाने ले गए थे। वह अपने दोस्तों से मिलने चले गए और मुझसे बोले कि मैं वहीं एक जगह पर बैठूं। कहने लगे कि अपने दोस्तों से मिल कर बस अभी लौटते हैं। उनके जाने के बाद मैं स्टूडियो में बैठा-बैठा सोच रहा था कि मेरे लिए इस जगह से ज्यादा सुकून भरी कोई और जगह हो ही नहीं सकती, यह स्कूल, खेल के मैदान, किसी कजन के घर या दुनिया की किसी भी जगह से ज्यादा आरामदायक है।

मुझे खुशी है जो करना चाहता था वह कर रहा हूं
मुझे लगा कि स्टूडियो पूरी दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह है। मेरी नजरों के सामने एक कैबरे डांस की शूटिंग चल रही थी और वे इसे बार-बार दोहराते रहे। लेकिन हकीकत मुझे उस शाम की सबसे गहरी जो चीज याद है, वह है मेरे पिता का आदेश- ‘यहां बैठो और हिलना मत, और कहीं मत जाना।‘ आज जब मैं उस घटना को पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि मैं तो बीते 25 साल से वहीं बैठा हूं, क्योंकि उसके बाद से पूरी जिंदगी मैं वहीं रहने का सपना देखता रहा और मुझे खुशी है कि मैं वहीं बैठा हुआ हूं और मुझे जो करना है वह कर रहा हूं।” ये तमाम चीजें जो मैंने बनाई हैं- मुझे लगता है कि मैं 9 फिल्में बना चुका हूं और 10वीं बनाने जा रहा हूं, इसमें 25 साल बीत गए हैं, अभी 25 साल और बिताने हैं। ‘हीरामंडी’ आजादी से पहले के आबाद कोठों की दास्तान सुनाती है।

हीरामंडी 14 साल पहले मेरे दोस्त लेकर आए थे
नेटफ्लिक्स ने हाल ही में ‘हीरामंडी’ को अपनी वैश्विक कार्यक्रम सूची का स्पॉटलाइट शो घोषित किया है। इस ग्रैंड प्रोजेक्ट के बारे में संजय लीला भंसाली ने बताया, “हीरामंडी एक ऐसी चीज थी, जिसे मेरे दोस्त मोइन बेग मेरे लिए 14 साल पहले लेकर आए थे। आखिरकार जब हमने इसे नेटफ्लिक्स के सामने पेश किया तो उनकी बांछें खिल गईं! उन्हें लगा कि इसको एक मेगा-सीरीज में तब्दील करने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यह बड़ी महत्वाकांक्षी चीज है। यह बहुत बड़ी है। यह विराट है! यह आजादी से पहले वाली तवायफों की कहानी है। वे संगीत, शायरी, नृत्य को जिंदा रखती थीं और कोठों के भीतर चलने वाली राजनीति के बीच जीने की कला के दम पर विजेता बन कर उभरती थीं।”

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