कोंढाणा किले की लड़ाई से 5 सबक: बड़े प्रोजेक्ट में जल्दबाजी न दिखाएं, रिसर्च और प्लानिंग जरूरी

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एक घंटा पहले

‘गढ़ आला पण सिंह गेला’

– छत्रपति शिवाजी, सिंहगढ़ (कोंढाणा) किले की जीत के अवसर पर

संडे मोटिवेशनल करिअर फंडा में स्वागत!

कैसे मराठा ताकत बनती चली गइ

एक प्रोफेशनल या स्टूडेंट को इस मोटिवेशनल स्टोरी से लीडरशिप और लाइफ के बड़े सबक मिलेंगे।

‘गढ़ आला पण सिंह गेला’ अर्थात ‘किला जीत लिया लेकिन शेर चला गया’। ये शब्द छत्रपति शिवाजी ने कोंढाणा किले पर जीत हासिल होने लेकिन उस युद्ध में अपने सबसे खास सेनापति तान्हाजी मालुसरे के शहीद होने पर कहे थे।

बात सत्रहवीं शताब्दी के भारत की है, जब शिवाजी के नेतृत्व में मध्य भारत ‘स्वराज्य’ की ओर अग्रसर था। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी की बढ़ती हुई ताकत से परेशान मुगल बादशाह औरंगजेब ने दक्षिण में अपने सूबेदार को मराठाओं पर आक्रमण का आदेश दिया।

शिवाजी के पास उस वक्त तक बड़ी संख्या में किले थे, लेकिन धीरे-धीरे मुगलों ने कई किले अपने अधीन कर लिए। वर्ष 1665 में पुरंदर की संधि में शिवाजी को कोंढाणा का किला भी देना पड़ा। इस संधि के बाद शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए तो वहां धोखे से उन्हें बंदी बना लिया गया। शिवाजी किसी तरह कैद से निकलकर महाराष्ट्र पहुंचे और उन्होंने इस संधि को अस्वीकार कर दिया।

इसके बाद मुगलों के कब्जे में गए मराठा किलों को फतह करने का सिलसिला शुरू हुआ। कोंढाणा का किला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि कहा जाता था कि ये किला जिस किसी के पास भी होगा उसका ‘पूना’ पर अधिकार होगा। कोंढाणा का किला मुगल-राजपूत कमांडर उदयभान राठौड के नियंत्रण में लगभग 5000 सैनिकों द्वारा भारी रूप से सुरक्षित किया गया था। शिवाजी ने इस किले पर नियंत्रण के लिए अपने सबसे खास सेनापतियों में से एक तान्हाजी को चुना।

आज सिंहगढ़ किले के ऊपर तान्हाजी मालुसरे की याद में उनका एक स्मारक भी है।

कोंढाणा किले की लड़ाई से 5 सबक

1) समर्पण और निष्ठा

कहा जाता है कि जब शिवाजी की ओर से इस किले को फतह करने का आदेश मिला तब तानाजी अपने बेटे की शादी में व्यस्त थे, लेकिन ये आदेश पाते ही तानाजी ने कहा कि अब पहले किला लेंगे तब शादी की बात होगी।

तान्हाजी की मृत्यु के बाद स्वयं शिवाजी ने तान्हाजी के कर्तव्यों को पूरा किया। यह एक दूसरे के प्रति समर्पण ही होता है जो बड़े साम्राज्यों के निर्माण में सहायक होता है।

हमारा सबक – प्रायोरिटी ठीक रखें

2) रिसर्च, एनेलिसिस और प्लानिंग

सिंहगढ़ पर कब्जा करना आसान नहीं था। इसके लिए किले की दीवारों पर सीधी चढ़ाई चढ़नी थी और फिर दुश्मन को परास्त कर युद्ध में जीत हासिल करनी थी। इस बात की काफी संभावना है कि तान्हाजी ने ऑपरेशन कोंढाना की योजना बनाने में पर्याप्त समय लिया होगा।

उन्होंने किले के संचालन, दैनिक गतिविधियों, किले के कमांडर उदयभानु के चरित्र और व्यक्तित्व आदि के बारे में अच्छी जानकारी एकत्र की। शायद उन्होंने भेष बदलकर खुद किले का दौरा किया और अपने लोगों को इस काम में लगाया। जब उन्होंने किले की कड़ी सुरक्षा और उसके शासक उदयभानु के निर्मम चरित्र को देखा, तो उन्होंने महसूस किया कि उन्हें ऐसा समाधान ढूंढना होगा जिसे हम आज ‘आउट ऑफ बॉक्स सॉल्यूशन’ कहते हैं।

हमारा सबक – जल्दबाजी में बड़ा प्रोजेक्ट नहीं करें

3) लीक से हटकर समाधान

तान्हा जी ने पारम्परिक तरीके से हमला करने की बजाय, किले की सुरक्षा में एक बहुत ही छोटी सी खामी का फायदा उठाने का फैसला किया। दरअसल किले के पश्चिमी छोर पर एक खड़ी चट्टान है जहां बहुत ही कम गश्त हुआ करती थी। ऐसा माना जाता था इस चट्टान पर चढ़ना लगभग असंभव है।

तान्हाजी ने इसी रास्ते से कुछ सैनिकों को लेकर पहले भीतर जाने और किले के दरवाजे खोलने तथा उसके बाद बाकि मराठा सैनिकों की टुकड़ी के प्रवेश की योजना बनाई और इसके लिए मध्यरात्रि का समय चुना। उनकी योजना रणनीतिक रूप से सटीक थी।

हमारा सबक – जो कोई न सोचे वैसा करें

4) कम रिसोर्सेस में अधिक परिणाम

यदि आप रणनीतिक रूप से सही हैं तो थोड़ा ही अधिक होता है!

क्योंकि तान्हा जी की योजना रणनीतिक रूप (रात के वक्त की गई सर्जिकल स्ट्राइक) से सही थी, वे केवल 300 (विभिन्न स्त्रोत 300 से 800 की बात करते हैं), सैनिकों के साथ ही लगभग 5000 मुगल सैनिकों द्वारा सुरक्षित कोंढाणा किले को जीत पाए।

हमारा सबक – इनोवेटिव रिसोर्स प्लान बनाएं

5) आपदाओं को संभालना (डिजास्टर कंट्रोल)

बिना पता चले गेट खोलने का मौका बहुत दुर्लभ था और मुट्ठी भर सैनिकों के साथ किला जीतना और भी मुश्किल था। तान्हाजी के दिमाग यह निश्चित तौर पर रहा होगा की कुछ भी हो सकता है और वे है स्थिति से निपटने के लिए तैयार थे इसीलिए उनकी मृत्यु के बाद सैनिकों में भगदड़ नहीं मची (जैसा की प्रायः इस तरह की परिस्थिति में होता है)।

जैसे ही तान्हाजी शहीद हुए उनके भाई सूर्याजी और शेलार मामा ने नेतृत्व संभाल लिया। ऑपरेशन में यह बहुत क्रिटिकल समय था, तान्हाजी के अभाव में सही नेतृत्व ना होने से मराठा हार सकते थे।

हमारा सबक – वर्स्ट सिचुएशन की प्लानिंग करें

कोंढाणा किला बना सिंहगढ़

जीत के बावजूद, शिवाजी अपने सबसे सक्षम सेनापति को खोने से बहुत आहत हुए और तान्हा जी के सम्मान में, उन्होंने कोंढाणा किले का नाम बदलकर सिंहगढ़ किला कर दिया (क्योंकि वह तानाजी को ‘सिंह’ कहते थे)। तान्हा जी के ये किला जीतने के कुछ समय बाद औरंगजेब ने एक बार फिर ये क़िला जीत लिया। लेकिन इसके बाद नावजी बालकावडे ने तान्हा जी की तरह लड़ते हुए ये किला दोबारा हासिल किया और आखिर में महारानी ताराबाई ने औरंगजेब से लड़कर इस किले पर जीत हासिल की।

आज का संडे मोटिवेशनल करिअर फंडा यह है कि कमांडर की प्लानिंग की क्वालिटी ही तय करती है फाइनल रिजल्ट क्या होगा, और किसी और को दोष नहीं देना चाहिए।

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