भास्कर इंटरव्यू: मैं पूरी तरह क्रिएटिव फील्ड की फ्रीडम के पक्ष में हूं, फिल्मों का विरोध करे पर संविधान के दायरे में: कुमुद मिश्रा

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2 घंटे पहलेलेखक: शशांक मणि पाण्डेय

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क्रिएटिव फील्ड में किसी तरह का सेंसरशिप नहीं होना चाहिए। विरोध होना जायज है लेकिन संविधान के दायरे में रहते हुए हो तो ज्यादा उचित है। सेंसरशिप और जल्द ‌आहत होने वाली भावनाओं पर बॉलीवुड एक्टर कुमुद मिश्रा ने बताया अपना पक्ष साथ ही अपने संघर्ष, आर्ट और सिनेमा पर दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। पेश हैं इसके प्रमुख अंश-

थिएटर के बाद फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने का संघर्ष कैसा रहा?
मुझे नहीं लगता मेरी पास ऐसी कोई कहानी है। सच कहूं तो मैंने संघर्ष ही नहीं किया अगर मेरा स्ट्रगल रहा है तो वह खुद के काम से रहा है। जो काम मुझे दिया हुआ है उसे मैं कितने ईमानदारी से कर पाता हूं यही मेरा संघर्ष है। मुंबई में सरवाइवल का किसी प्रकार का स्ट्रगल नहीं रहा। अगर रहा भी है तो मुझे इसका एहसास नहीं हुआ है और यह प्रोफेशन मैंने चुना था तो संघर्ष का सवाल ही नहीं उठता।

अपने पुरुष प्रधान और महिला प्रधान फिल्में दोनों की हैं, जिसमें एक कमर्शियल भी रही क्या सामनता है?
दोनो की कहानियां डिफरेंट हैं तो काम करने के उसके सुख भी अलग हैं और दुख भी, दोनों की तुलना नहीं कर सकते है। बहुत कुछ अलग होता है लोकेशन का वहां के एक्टर्स का आप नया सीखते हो। इस माध्यम का मैजिक यही है कि आप एक चीज के आदी नही हो सकते।

थप्पड़ जैसी फिल्मों पर आप का क्या स्टैंड है?
जी हां, ऐसी फिल्में बननी चाहिए जिससे एक चर्चा हो, अनुभव सर की पहचान यही हैं कि उनकी फिल्में रिलीज होने के बाद चर्चा का विषय बनती हैं। उनकी फिल्मों में बहस होती है कुछ पक्ष में होते हैं कुछ विपक्ष में होते हैं। इन फिल्मों का हिस्सा होना भी अलग सुख है। आपके द्वारा कही गई बात पर चर्चा हो यही आर्ट की खासियत है रोल है।

सेंसरशिप और जल्द ‌आहत होने वाली भावनाओं और उससे होने वाली हिंसात्मक विरोध पर आपके क्या विचार हैं?
हूं, मतलब किसी भी तरह की फ्रीडम के पक्ष में हूं। समाज यह डिसाइड करेगा समाज से मेरा मतलब कॉन्सिट्यूशनल ढाचे से है। मुझे नहीं लगता किसी को भी इंडिविजुअल तरीके से हिंसा करने का हक है। आपके पास संवैधानिक तरीके हैं आप उसके हिसाब से उसका विरोध कीजिए। एक उम्र के बाद आप आजाद हैं, अपने विचारों से लेकिन एक जिम्मेदारी जरूर होनी चाहिए जिसके मापदंड संविधान में दिए हैं। किसी को एक थप्पड़ मारना भी एक तरह का ह्यूमिलिएट करने के बराबर है।

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