मूवी रिव्यू: अपने आसपास की कहानी लगती है ‘ऑपरेशन रोमियो’, फिल्म में कंटीन्यूटी गायब

0
37


36 मिनट पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय

  • कॉपी लिंक

किसी फिल्म की रीमेक के बारे में सुनते हैं, तब उम्मीदें दोगुनी लगा बैठते हैं। फिल्म ऑपरेशन रोमियो साउथ की रीमेक फिल्म है। 22 अप्रैल को रिलीज होने जा रही इस फिल्म की कहानी निजी जीवन में पढ़ी-सुनी गई-सी लगती है। मोटे तौर पर कहानी की बात की जाए, तब आदित्य शर्मा (सिद्धांत गुप्ता) के घर बहन की शादी की तैयारियां चल रही होती हैं। उसी दौरान आदित्य और नेहा कलसीवाल (वेदिका पिंटो) के बीच प्यार-रोमांस जोरों पर होता है।

नेहा का बर्थडे आता है, उसी अवसर पर आदित्य उसे घुमाने निकलता है। रात में एक जगह कार खड़ी करके दोनों प्यार-रोमांस करने लग जाते हैं। उनके बीच चल रहे प्यार-रोमांस के रंग में भंग तब पड़ जाता है, जब मंगेश जाधव (शरद केलकर) और किरन मामा (किशोर कदम) आ धमकते हैं। मंगेश वीडियो बनाने लगता है।

कहानी में दिलचस्प मोड़ आता है
आदित्य के विरोध पर दोनों खुद को पुलिस वाला बताकर उसे न सिर्फ परेशान करते हैं, बल्कि नेहा के साथ छेड़खानी भी करते हैं। नेहा और आदित्य को रात भर परेशान कर सुबह अच्छी-खासी रकम ऐंठकर चले जाते हैं। मानसिक रूप से तंग आदित्य अपना बदला लेने मंगेश के घर जा पहुंचता है, इसके बाद कहानी में दिलचस्प मोड़ आता है। आदित्य वहां मंगेश की वाइफ छाया (भूमिका चावला) और बेटी के साथ क्या कारनामे करता है, किस तरह से दोनों को सबक सिखाता है, इसके बाद और क्या-क्या होता है, इस सबका राज जानने और मनोरंजन के लिए थिएटर जाना होगा।

शरद एक्टिंग से निराश करते हैं
फिल्म में कलाकारों की बात की जाए, तब सिद्धांत, वेदिका, शरद आदि का अभिनय औसत लगता है। कई जगहों पर कलाकारों के चहरे से डर और दर्द गायब-सा लगता है। एक सीक्वेंस में सिद्धांत जब शरद का सिलाई मशीन से मारकर टांग तोड़ देता है और साथ ही संवाद जारी रखता है, तब उम्दा कलाकार होने के बावजूद शरद केलकर के चेहरे से वह दर्द का भाव गायब नजर आता है। ऐसा लगता है कि उन बारीकियों को पकड़ने में वे कहीं न कहीं चूक गए हैं। यहां कुल मिलाकर भूमिका चावला के अभिनय की तारीफ करनी होगी, क्योंकि उन्होंने एक महाराष्ट्रियन महिला और मां के रोल को बखूबी निभाया है।

फिल्म में कंटीन्यूटी गायब है
फिल्म की कहानी का सब्जेक्ट अच्छा उठाया गया है। ऐसी कहानियां जब बयां की जाती है, तब लगता है कि यह तो घटना अपने आसपास के लोगों के साथ घटित हुई है। ऐसी कहानियों को सुना-पढ़ा, देखा या फिर अपने करीबी भुगतभोगी को जानते हैं। इन बातों की कमी फिल्म में थोड़ी-सी खलती है। इसकी वजह कहीं न कहीं लेखन और निर्देशन में सिनेमाई लिबर्टी नहीं लिए जाने की वजह से लगती है। कुछ सीन को देखकर लगता है कि वह टुकड़ों में फिल्माया गया है, जिससे कंटीन्यूटी गायब-सी लगती है।

सामाजिक मुद्दे पर है फिल्म
आखिर में इस सबके बावजूद फिल्म में काफी कुछ देखने को जरूर मिलेगा, क्योंकि कहानी का विषय-वस्तु बड़ा मार्मिक है। फिल्म में कुछ सीन जबर्दस्त हैं। एक सीन में जब आदित्य सारा कंफ्यूजन दूर होता है और वह नेहा से मिलने आता है। तब नेहा, आदित्य से पूछती है कि क्या मेरे साथ वह सब हुआ होता, जो तुम सोच रहे थे, तब भी मुझे अपना लेते। इस सवाल पर वह इधर-उधर देखने लगता है। ऐसे सामाजिक मुद्दे और घटनाओं को बड़े मनोरंजक अंदाज में कहने का प्रयास किया गया है, इसके लिए फिल्म देखी जा सकती है। फिलहाल, इसे पांच में से ढाई स्टार दिए जा सकते हैं।

खबरें और भी हैं…



Source link