रश्मि रॉकेट: फिल्म की रिसर्च में दो महीने और स्क्रीन प्ले तैयार करने में सात से आठ महीने लगे, बोर्ड पर सबसे पहले आईं तापसी पन्नू, फिर चार प्रोड्यूसर और तीन राइटर्स किए गए साइन

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एक घंटा पहलेलेखक: अमित कर्ण

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इस दशहरा पर तापसी पन्नू की एक और स्पोर्ट्स बेस्ड फिल्म ‘रश्मि रॉकेट’ आ रही है। इसमें वो गुजरात के एक छोटे शहर से ताल्लुक रखने वाली एथलीट का रोल प्ले कर रही हैं, जो आगे चलकर एथलेटिक्स एसोसिएशन के विवादास्पद नियम और प्रैक्टिस जेंडर टेस्टिंग का विरोध करती है। तापसी ने पूर्व में ‘सांड की आंख’ में शूटर दादी का रोल प्ले किया था। वहां भी एक टैबू टॉपिक को उनके किरदार ने उठाया था। इस फिल्म का स्क्रीन प्ले अनिरूद्ध गुहा ने लिखा है। वो अपने जमाने के मशहूर फिल्मकार दुलाल गुहा के ग्रैंडसन हैं।

अनिरूद्ध ने की फिल्म से जुड़ी कुछ खास बातें शेयर

अनिरूद्ध ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की और बताया, “अमूमन फिल्मों की मेकिंग की क्रोनोलोजी में पहले राइटर और डायरेक्टर ऑन बोर्ड आते हैं। यहां ‘रश्मि रॉकेट’ के मामले में पहले हमारी स्टार तापसी पन्नू साइन हुई थीं। उन्होंने खेलों में जेंडर टेस्टिंग के आइडिया को जांचा था। यह एक ऐसी मेडिकल जांच है, जिसमें महिला खिलाड़ियों का शोषण होता रहा है। तापसी को दरअसल नंदा पेरियासामी ने सबसे पहले इसकी वन लाइनर कहानी सुनाई थी। आगे चलकर मैं और फिर कनिका ढिल्लो इसकी रायटिंग के लिए हायर हुए। तापसी एक फिल्म फेस्टिवल में ‘मुल्क’ की स्क्रीनिंग कर रही थीं। वहां उनकी मुलाकात आकर्ष खुराना से हुई थी, जो अपनी फिल्म ‘कारवां’ वहां शो कर रहे थे। आकर्ष को भी कहानी जंची और फिर नंदा पेरियासामी से राइट्स लिए गए। फिर कुल चार प्रोड्यूसर बोर्ड पर आए और यह फिल्म बनी।”

अनिरूद्ध ने बताया कि यह फिल्म सत्य घटनाओं पर बेस्ड है

अनिरूद्ध ने यह साफ किया कि यह फिल्म किसी की बायोपिक नहीं, बल्कि सत्य घटनाओं पर बेस्ड है। फिल्म से एक बड़े मसले को उठाया जा रहा है। अनिरूद्ध कहते हैं, “भारत में वैसे भी जेंडर को लेकर आम लोगों में काफी गलतफहमियां हैं। यहां बस मेल और फीमेल जेंडर ही समझ में आते हैं। बाकी जेंडर के लोगों को वो प्रॉब्लम ही मान कर चलते हैं। जेंडर टेस्टिंग में महिला को सही या गलत इस बात पर कह दिया जाता है कि उनके ब्लड में एस्ट्रोजेन या टेस्टेस्टोरेन नामक हार्मोन की मात्रा कितनी है। जबकि हकीकत यह है कि शरीर में हार्मोन्स कुदरती रूप से पैदा होते हैं। उस पर किसी इंसान का कंट्रोल नहीं हो सकता। फिर भी एथलेटिक एसोसिएशन फीमेल एथलीट्स को बैन कर देता है। जेंडर टेस्टिंग एक विश्वव्यापी चलन है। दूसरे देशों में हालांकि जेंडर टेस्टिंग के तरीके अलग हैं। यह साथ ही डोपिंग और अल्ट्रासाउंड वाले टेस्ट से अलग है।”

‘रश्मि रॉकेट’ स्पोर्ट्स फिल्म नहीं बल्की इंसानी हक की कहानी है

अनिरूद्ध आगे कहते हैं, “इस तरह ‘रश्मि रॉकेट’ महज स्पोर्ट्स फिल्म नहीं है। इसमें स्पोर्ट्स बस एक बैकड्रॉप है। इसमें इंसानी हक की कहानी कही गई है। इसमें यह जाहिर करने कोशिश की गई है कि सिर्फ ब्लड टेस्ट के आधार पर किसी की आइडेंटिटी खत्म नहीं हो सकती है। मेकर्स, तापसी और मेरी इस रिसर्च पर खासा वक्त दिया गया है। सिर्फ जेंडर टेस्टिंग की बारीकियों और प्रावधानों पर ही दो महीने गए हैं। इस मसले पर सालों से लिखते रहने वाले एक स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट की मदद ली गई। चार और पांच ड्राफ्ट लिखने के बाद कनिका ढिल्लों को हायर किया गया। उन्होंने इसके डायलॉग लिखे हैं।”

निधि परमार ने ऐसी फिल्मों पर की बात

‘सांड की आंख’ की प्रोड्यूसर निधि परमार कहती हैं, “मैं सभी निर्माताओं के लिए नहीं बोल सकती, लेकिन मैं ऐसी कहानियां बनाने के लिए उत्साहित हूं, जो महिलाओं और उनकी उपलब्धियों को जीवन के सभी क्षेत्रों से सेलिब्रेट करें। करेंट ट्रेंड भी यही है कि महिला विजय की कहानियों को लास्ट डिकेड के मुकाबले अब बहुत अधिक दिलचस्पी और सपोर्ट मिल रहा है।”

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